Thursday, 23 June 2016

तबियत ख़राब नहीं है, पीरियड्स हैं

कक्षा ग्यारहवीं। मासिक धर्म के पांचों दिन खत्म हो चुके थे। रोज़ाना की तरह मैं साइकिल से घर लौट रही थी, और किसी शारीरिक समस्या के कारण मुझे पुनः रक्त-स्राव हुआ और मुझे इसका अहसास तक नहीं हुआ।  स्कूल यूनिफॉर्म भी सफ़ेद थी। रास्ते भर मैं अनभिज्ञ रही, इसलिए अगर किसी ने देखा भी हो ( जो कि देखा ही होगा )  तो मुझे एहसास ही नहीं था। घर लौटने पर ट्रिन -ट्रिन के साथ मम्मी ने दरवाज़ा खोला और मेरे कपड़े देखकर हैरान रह गई। मैंने पलटकर देखा तो खून से सनी स्कर्ट देखकर जो पहला ख्याल आया वह था - 'न जाने रास्ते भर कितने लोगों ने देखा होगा' और पहला सवाल था 'पापा और भाई घर पर तो नहीं हैं?' छिपते-छिपाते मैं बाथरूम तक गई और ये ख्याल बहुत बाद में आया कि यूँ एक ही माह में दोबारा मासिक स्राव का होना कितना असामान्य है। उल्टा ये ख्याल बुरी तरह हावी रहा कि कितने अजनबी लोगों ने मेरी स्कर्ट देखी होगी। मैं खुद को अपमानित महसूस कर रही थी।  

पिछले दिनों पीरियड्स से लथपथ कपड़ों पर एक लड़की की ज़बरदस्त हूटिंग की गई, उसने खुद को इतना ह्यूमीलीएट महसूस किया कि आत्महत्या कर ली (खबर कितनी सही थी मैं नहीं जानती, ढूँढ़ने पर भी पुनः वह लिंक उपलब्ध नहीं हो पाया) लेकिन एक सामान्य सी सोच है।  पेट दर्द है, क्रैंप्स हैं लेकिन कहा जाता है कि तबीयत खराब है, यह कहते हुए नहीं पाया जाता कि मेंस्ट्रुअशन हैं। सेनेटरी नैपकिंस छिपाकर खरीदे व रखें जाते हैं। डिस्पोज़ तो उससे भी ज़्यादा छिपाकर। ऐसे में अगर वही लाल रंग आपके कपडों पर फैलकर दिखने लगे तो कहना ही क्या ! इस खबर में सच्चाई हो या ना हो, लेकिन ये बात नकारी नहीं जा सकती कि तमाम तरह के स्त्रीवादी विमर्शों के बावजूद हमारा समाज स्त्रियों और उनकी समस्याओं के प्रति अभी तक असंवेदनशील ही बना हुआ है। इसे शर्म का विषय मानते हुए लड़कियों ने कोड लैंग्वेज तक ढूंढ निकाली है, वे कहती हैं 'आय एम डाउन' ! मुझे लगता है पीरियड्स के दौरान जो महसूस होता है उसे 'डाउन' शब्द से जताना बिलकुल अनुचित है। जो है वही कहा जाए यही सबसे बेहतर है। 

A Spanish female group has made a public statement by wearing white pants covered in menstrual blood stains. ( Source  : Google)
पीरियड्स को लेकर लड़के और लड़कियों दोनों में अज्ञानता है , उसे दूर होना चाहिए। यदि इस पर खुलकर बात की जाए तभी लड़के इसे सही तरह से समझ पाएंगे और लड़कियां अपनी अकारण शर्म और झिझक से मुक्ति पा सकेगीं। ज्ञान के स्तर पर इस प्रक्रिया को समझना दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। अकादमिक तौर पर यह जानकारी जिस गम्भीरता के साथ दी जानी चाहिए, नहीं दी जाती। मुझे याद है कि नवीं कक्षा में विज्ञान का  'रि-प्रोडक्शन' अध्याय कैसी जिज्ञासा पैदा करता था लेकिन उस पाठ को बस खानापूर्ति की तरह पढ़ाकर हमारी शिक्षिका अवश्य ही कोई नैतिक धर्म का पालन कर रही थीं। खैर ! फिलहाल कुछ उद्धरण यहां उद्धृत कर रही हूँ, जिससे कम-से-कम यह समझ विकसित हो सके कि यह एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है जिसमें उत्कंठा और शर्म दोनों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। 

"ज्यादातर महिलाएं माहवारी (Menstrual cycle) की समस्याओं से परेशान रहती है लेकिन अज्ञानतावश या फिर शर्म या झिझक के कारण लगातार इस समस्या से जूझती रहती है। यह भी बता दें कि माहवारी है क्या. दरअसल दस से पन्द्रह साल की लड़की के अण्डाशय हर महीने एक परिपक्व अण्डा या अण्डाणु पैदा करने लगता है। वह अण्डा डिम्बवाही थैली (फेलोपियन ट्यूब) में संचरण करता है जो कि अण्डाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है तो रक्त एवं तरल पदाथॅ से मिलकर उसका अस्तर गाढ़ा होने लगता है। यह तभी होता है जब कि अण्डा उपजाऊ हो, वह बढ़ता है, अस्तर के अन्दर विकसित होकर बच्चा बन जाता है। गाढ़ा अस्तर उतर जाता है और वह माहवारी का रूधिर स्राव बन जाता है, जो कि योनि द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है। जिस दौरान रूधिर स्राव होता रहता है उसे माहवारी अवधि/पीरियड कहते हैं।" (मासिक धर्म : विकिपीडिया) 

बीबीसी के द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को यदि सही मानें तो प्रतिदिन लगभग 1 करोड़ महिलाएँ मासिक स्राव से गुज़रती हैं। ज़ाहिर है जिसकी अवधि 2-7 दिन होती है। दुनिया की आधी आबादी के सत्य को स्वीकार करने में अभी तक, 2016 के अत्याधुनिक युवा तक को इतनी कठिनाई है तो सोचिये अभी कितनी लंबी यात्रा तय करनी शेष है। जिसकी शुरुआत पीरियड्स पर बात करने, झिझक से मुक्त होने से की जा सकती है। हर माह दर्द  से कराहते हुए मैं कहूँगी तबियत खराब नहीं है, पीरियड्स है। आप कहेंगी?

10 comments:

  1. अदिति दी; आप बिलकुल सही कह रही हैं! प्राकृतिक व्यवस्थाओं को को लेकर हीनता बोध सिर्फ ज्ञान की कमी को ही नही दर्शाता है, बल्कि समाजमनोविज्ञान को भी दर्शाता है और उचित समय पर तथाकथित नैतिक दबाव के कारण शिक्षक द्वारा पूरी जानकारी न दिये जाने से ही प्राकृतिक व्यवस्थाओं के प्रति हीनताबोध और घृणाबोध(पुरुष समाज में) जैसे असहज भाव उपजते हैं। साथ ही इसमें परिवार कि भी अप्रत्यक्ष भूमिका होती है क्योंकि परिवार द्वारा भी इसी नैतिकता क दबाव में पूरी जानकारी नही दी जाती है और एक अस्वस्थ मानसिकता उपजती है। और, भारतीय समाज; जो कि पुरुष प्रधान अब भी है(जिसे बदलने में सदियाँ लगेंगी क्योंकि प्रत्यक्षतः सत्ता बदलने के बाद मानसिकता के स्तर पर लम्बे समय तक रहेगा) उसमें इन प्राकृतिक व्यवस्थाओं के प्रति एक अस्वस्थ मानसिकता का आग्रह बना हुआ है, मासिक धर्म जैसी प्राकृतिक व्यस्थाओं को लेकर भी महिलाओं को ही दोषी माना जाता है और अभद्र टिप्पड़ियाँ की जाती हैं! आपका लेख शानदार है, पर एक शंका भी है कि बेबाकी भरे इस लेख को लेकर तथाकथित भारतीय संस्कृति क रक्षकों को आपत्ति ना हो जाए!

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    2. आपकी बात सही है। पर हमें कोशिश करनी चाहिए कि खुलकर इसपर बात करें। ताकि ये 'टैबू' दूर हो सके. मुझे उम्मीद है कि ऐसी कोशिशें रंग लाएँगी। :)

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    3. जी बिलकुल दी!

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    1. शुक्रिया प्रभांशु ! :)

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  3. Aditi ji आपका पोस्ट महिला जागरूकता को प्ररित करने वाली है और आपने इस गम्भीर विषय को प्रकाश में लाया। लाख शुक्रिया

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    1. शुक्रिया आपका, उम्मीद है ज़्यादा से ज़्यादा लोग यह बात समझें.

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  4. Aditi ji आपका पोस्ट महिला जागरूकता को प्ररित करने वाली है और आपने इस गम्भीर विषय को प्रकाश में लाया। लाख शुक्रिया

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