Saturday, 28 May 2016

माँ

जिस मोड़ से
आगे बढ़ गयी थी माँ
वहाँ से मैं कुछ और माँ जैसी हो गयी थी
माँ की साडी में लिपटकर
सारे रंग बिखर गए थे मेरी देह पर
माँ सा हो पाना बस एक ख़्वाब है

घर लौट लौट आना होगा
 वो घर को सहेजे रखेगी
कि शाम तक सारे पंछी
किस्सों की दुनिया से आएँगे
और वो सुनकर बस मुस्कुरा देगी

आसमान का आखिरी टुकड़ा वो बचाकर रखेगी
मेरी हर उड़ान के लिए
मेरा सारा स्नेह बस इस कविता तक सिमटकर रह जाएगा

उस मोड़ पर आँसू अब भी होगा क्या
उन कमरों में छूट गया सामान अब कहाँ होगा
सोते हुए कितनी निरीह लगती है माँ
सूखे अधखुले होंठ
जिन्हें चूमने से खरगोश के जैसे चौंक जायेगी माँ

कितनी बड़ी तसल्ली है कि
सब तरफ से ठुकराये जाने पर
गले से लगा लेगी माँ
मेरी चंदा कहकर
छिपा लेगी ।

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