Thursday, 29 June 2017

अवस्थाएँ

यूँ काँटों से लदा पेड़ 
आँगन में कोई लगाता है क्या
हर एक काँटे पर चिपका एक लम्हा
एक याद एक टीस
एक खुशबू भी
और एक सपना 

पहली-पहली बार हाथों में लगी मेहंदी
और नाखून कचोटने लगे हथेलियों को
कि तुमने नहीं देखा
रुक जाऊँ कि चलूँ किसी ओर
एक झोंका हवा का दिशा कोई दे जाए

'क्या तुम उल्हाने देना छोड़ नहीं सकती?'
छोड़ दोगी तो देखो कितनी आसानी होगी
थोड़ा खून बहेगा, थोडा सा दर्द होगा
एक पत्थर छाती पर जम जाएगा
गले में जमा मोम पिघल कर 
चीरते हुए पेट में उतर जाएगा
कुछ नसें फड़केंगी, कुछ धड़कने तडपेंगी 
एक कील सी ठुक जाएगी
ठीक बीच एक सपने के
बिखर जाएंगी चिंगारियाँ 
आँखों से होते हुए पूरे शरीर पर
आत्मा पर पड जाएंगे कुछ फफोले
पर खुद ही सोचो, कितनी आसानी होगी 

अपने सच से दूर ला खड़ा कर
तुम्हें दूँ सज़ा 
कि तमाम ताक़तें तुम्हारी 
नाकाफ़ी हों 
मुझे छू सकने में
तुम छुओ मैं गल जाऊँ 
तुम रो'ओ मैं पिघल जाऊँ
अपना आकार खो दूँ
ठोस होना या बने रहना 
पीड़ा का एक स्तर है
तरलता दूसरा
उड़ जाना माने निजात
देह के सभी बंधनों से.

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