Monday, 26 December 2016

बकाया और कितना है?

ये अन्धेरा हटा दो
कि सांस मिले
थोड़े घुँगरू
और चार फुर्सती साँसें
कोई कला जो रोम-रोम में भरे
उजालों और अंधेरों से परे

प्यार नहीं
दर्द दो
खिड़की नहीं
दीवार दो
हाथ नहीं
हथौड़ा दो
पैसा नहीं
किताब दो
रोटी नहीं
जज़्बात दो

यूं माँगना अच्छा नहीं लगता।
हवा में खाली रहे
5  फ़ीट 3 इंच  जगह
और मैं रहूँ

वो दरवाज़ा खुले
जहाँ मंज़िल झाँके
पुकारे मुझे
और मैं विपरीत दिशा में चल पडूँ
कि जो तय किया
वो सफर मेरा कहाँ था 

जो साँसे जी अभी तक
वो उधार किसका चुकाया

बकाया और कितना है?



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