Thursday, 1 December 2016

खुशबुएँ सारी प्यार नहीं

प्यार नहीं

भीड़ के बीचों-बीच
हर आदमी से 
पूछा पता और अपना नाम  
वे नहीं जानते थे 
जानती थी मैं 
पर रुकना था 
या शायद पूछना 
वे बस खफ़ा हुए 

दस अंकों वाली एक संख्या

हम छील रहे थे खाल 
हमें रोकना नहीं  था 
आखिर तक ताकते रहना था आसमाँ 
उबलती आँखों की ठंडक में उतरना था और गहरे 
बुझती लौ को रोकना जैसे जलाना खुद को  

हमें चुनने थे लोग 
और तय करने थे कुछ दोस्त 
बस शिकायतें 

वही लाल दीवार 
जहाँ से शुरू हुई थी खम्भों की गिनती 
जहाँ से शुरू हुई थी महफिलें 
आधी रात का चाँद 
और एक मोमबत्ती 

खूब रगड़ा माथा 
पलटे सारे पन्ने 
कुछ मिल नहीं रहा 
वो थैला 
थैले में रख दी बदहवासी 
गलती किस मोड़ पर छूटी?
या थी शुरुआत ही गलत 
लौटना या बढ़ना 
या बस बैठे रहना 
करना इंतज़ार 
कि झुके आसमान 
पूछे सवाल 
और मैं बस मुस्कुराऊँ 

कुछ भरोसे थे जिनकी जानें चली गई 
जिस मिट्टी में दफनाया उन्हें 
उसपर ही अब पौधा उगाना है

खुशबुएँ सारी 
प्यार नहीं.  


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